Sunday, 2 April 2017

मर्ज खुदगर्ज मेहनतकश

मेहनत से उठा हूॅं , मेहनत का दर्द जानता हूॅ,
आसमाॅं से ज्‍यादा जमी की कद्र जानता हूँ

लचिला पेड था जो झेल गया ऑंधिया ,
मै मगरूर दरख्‍तों का हश्र जानता हॅूं


छोटे से बडा बन्‍ाना आसॉं नहीं होता,
इस जिंदगी मैं  कितना जरुरी होता है सब्र जानता हूँ 

मेहनत बढ़ी तो किस्मत भी बढ़ चली ,
इन छालों में छिपी लकीरो  का असर जानता हूं । 

बेवक्त बेबाक बेवजह यूँही मुस्करा देता हू । 
आधे दुश्मनो को यू ही हरा देता हू । 

काफी कुछ पाया है मैने पर अपना कुछ न माना है ,
क्योकी एक दिन माटी में मिलना है ये जाना है मैने 




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